Sunday, June 24, 2012

               







     राजू की कहानी

इन तस्वीरों को देख कर आप समझ गए होंगे की हमारे देश में बचपन को बचाने  और देश के भविष्य को बेहतर बनाने के दावों की हकीकत क्या है .ये तस्वीर कोई नई  नहीं है की हमे घोर आश्चर्य में डाल दे,लेकिन इन तस्वीरों के माध्यम से इस घम्भीर मसले पर चिंतन और मंथन की ज़रुरत है . हैदराबाद से मुजफ्फरपुर के सफ़र के दौरान बरौनी जंक्शन पर एक बच्चे से बचपन छिनता   दिखा तो इसे कमरे में क़ैद कर लिया .अपनी जिंदगी की बोझ को लाठी के सहारे टिकाने  की कोशिश कर रहा ये है राजू. इसकी चेहरे की मासूमियत को देखकर ऐसा लगता है ,जैसे इसने अपने आप को समझा लिया हो की जिंदगी की रेस में अपनी गाड़ी को ऐसे ही  घसीटनी है ।राजू ट्रनो में कचरा साफ़ करता है ,जी हाँ रेलवे की बदिन्ताज़मी में अपने लिए अवसर तलाश कर ये अपना गुज़ारा करता है।जब एसी बोगी में हम गर्मी से दूर सुखद एहसास की अनुभूति कर रहे थे तब ये आस पास के कचरे को साफ़ कर रहा था, हाँ ये और बात है कि  राजू के माथे की पसीने को ए सी की ठंडी हवा भी नहीं सुखा पा रही थी,हो भी क्यों न गरीबी और लाचारी की तपिश जो ज्यादा थी। साफ़ सफाई के बाद राजू ऐसे हाथ फैलता हो जैसे मौन मजदूर की भूमिका में हो, कोई दे तब भी ठीक न दे तब भी ठीक. जिस उम्र में लोग चहकते  और खिलखिलाते रहते है उसी उम्र में जिम्मेदारियों के एहसास ने राजू की खिलखिलाहट को उससे दूर कर दिया। बरौनी जंक्शन से हर रोज़ कितनी गाड़िया गुजरती है हजारों  लोग आते जाते हैं लेकिन राजू की जिंदगी इसी जंक्शन के इर्द गिर्द घुमती है इसकी जिंदगी में कोई रफ़्तार नहीं आता।राजू की कहानी तो एक बानगी भर है न जाने हमारे देश में कितने बच्चों से उनका बचपन ऐसे ही जुदा हो रहा होगा. हालाँकि तमाम राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय  संस्थाए बच्चों को लेकर गंभीरता दिखाती है और योजनाये भी बनती है लेकिन उसकी पहुँच इन तक नहीं हो पाती  है, क्यों- ये सवाल हमे अपने आप से करना चाहिए, क्योकि हमारे बीच के लोग ही इनके प्रति गैरजिम्मेदाराना रवैया   अपनाते है जिससे की न चाहते हुए भी इन्हें छोटी सी उम्र में जिम्मेदारियों का एहसास करना पड़ता  है। चलिए हम तो यही उम्मीद करेंगे की ट्रेनों की रफ़्तार को देखते देखते राजू की जिंदगी में भी एक दिन ऐसा आये जब वो भी अपने जीवन को रफ़्तार दे सके और जिंदगी के ट्रैक पर अपनी गाड़ी को सरपट दौड़ा पाए।

नोट -राजू काल्पनिक नाम है.

Monday, April 2, 2012

***तेरे होठो की हंसी***

तेरे होठो की हंसी हमें खूब भाती है
आँखे अथाह गहराइया बताती है
मुखड़ा सुन्दर  सुबह दिखता है
ये बिंदिया ये काजल ये लाली भी गजब ढाती है
तेरे होठो की हंसी ................
बिस्तर  पे लेटा सुनहरी यादों में खो रहा था
सपनो को रंग भर रहा था
चंचल हवा खिड़की से आती है
झकझोर कर किसी का एहसास करवाती है
अनायास ही तुम्हारी याद आती है
तेरे होठों की हंसी ...............
कभी कभी जब गुस्सा तुम्हारी हंसी को मुह चिढ़ाता
दिल बेचैन सा हो जाता है
ये और बात है की हमारी हरकतों से आपकी हंसी वापस आती है
वर्ना हमे कहाँ किसी का दिल बहलाना आता है
तेरे होठों की हंसी .................
किसी आँगन की अठखेलियाँ बरबस आकर्षित करती है
बेईमान मौसम भी बड़ा उकसाता है
इतने में तेरे आने की आहत होती है
ऐसा लगता है जैसे झूम के सावन आता है
तेरे होठों की हंसी हमे खूब भाती है

*******अबूझ पहेली*******

कैसी अबूझ पहेली है ये जिंदगी
कभी किसी के साथ तो कभी अकेली है ये जिंदगी 
आता है गमो का दौर भी जिसे खुशियों से है मिटाना 
अरमानो को है पलकों पे सजाना 
हर कीमत पे हो सफ़र ये सुहाना 
कभी बिछड़ा यार तो कभी सच्ची सहेली है ये जिंदगी 
कैसी अबूझ ..........................
है कठिन रह लेकिन उस पार है जाना 
मुश्किलों के बयार को चीर है अपना कीर्तिमान बनाना 
कभी राह आसन तो कभी कंटीली भी है जिंदगी
कैसी अबूझ..........................
किसी मोड़ पे होता सुखद एहसास तो कभी मिलता काँटों का ताज 
कठिनाइयो के भंवर को पर कर बनना है सरताज 
नाउमीदी का दामन छोड़ उम्मीद की किरणों को बुलाना है पास 
कभी अलसाई दोपहरी तो कभी शाम मस्तानी है ये जिंदगी
कैसी अबूझ ...........................
कभी मिलती सफलताए अपर तो कई बार झेलना पड़ता हार का वार
विपरीत बयार में भी हो हौसला बुलंद जीवन का यही मूल मंत्र 
कभी कर्कश आवाज़ तो कभी तान सुरीली है ये जिंदगी 
भले ही अबूझ पहेली हो लेकिन  बड़ी ही प्यारी है ये जिंदगी 

Monday, February 13, 2012

******************मोहब्बत एहसासों का एतवार है**********************

मोहब्बत एहसासों का एतवार है 
किसी से तुम्हे प्यार है किसी से हमे भी प्यार है 
पर किसे पता कौन खुद्दार है और कौन गद्दार है 
किसी का दिल जले किसी की रूह रोये 
इसकी किसे परवाह है
उन्हें तो बस अपनी अदाओ से प्यार है 
.मोहब्बत एहसासों का........
 वो दौर और था जब इसके माएने कुछ और थे 
वसूलो और भावनाओं की क़द्र होती थी 
परवाह नहीं एक दूजे से दूर या करीब थे 
वो तो प्यार था मगर आज ये एक व्यापर है 
मोहब्बत एहसासों का ...........
दुहाइआ सब देते खुद को आजमाने की 
मिटने और मिटने की 
पर ये हौसले दीखते है सिर्फ अफसानो में 
जाने कितने वक़्त गुजर गए बेजान बहानो में  
फिर भी न जाने क्यों इस एहसास के लिए ही दिल बेकरार है
मोहब्बत एहसासों का ............
वक़्त की तालीम तो मिलती है इन अनजान राहों में 
तब भी आ जाते बेबसी और लाचारी की बाहों में 
डगमगाने का डर तो है पर जीत का विश्वास भी 
आगाज के बुनियाद पर हर बार निर्भर नहीं होता अंजाम यहाँ 
फिर भी इस की चाहत बार बार है 
मोहब्बत एहसासों का एतवार है